जलेबी का मैदा और लड्डू का बेसन भी मौसम से सुरक्षित नहीं
कहानी सिर्फ चीनी तक सीमित नहीं है।
जलेबी के घोल में इस्तेमाल होने वाला मैदा गेहूं से आता है और गेहूं की फसल अपने महत्वपूर्ण विकास चरणों में अधिक तापमान के प्रति संवेदनशील होती है। बदलता तापमान और मौसम की परिस्थितियां गेहूं की उत्पादकता को प्रभावित कर सकती हैं।
इसी तरह बेसन से बनने वाले लड्डू, मैसूर पाक और कई दूसरी मिठाइयों के पीछे चना है। चने की पैदावार भी तापमान और पानी की उपलब्धता में बदलाव से प्रभावित हो सकती है। अलग–अलग क्षेत्रों में इसका प्रभाव अलग हो सकता है, लेकिन शोध ने दक्षिण एशिया में जलवायु परिवर्तन और चने की पैदावार के बीच संभावित संबंधों की ओर संकेत किया है।
इसका मतलब यह नहीं कि कल से लड्डू मिलना बंद हो जाएगा। लेकिन अगर मौसम की अनिश्चितता फसल की पैदावार और लागत को लगातार प्रभावित करती है, तो उसका असर धीरे–धीरे बाजार और फिर मिठाई की कीमतों तक पहुंच सकता है।
काजू कतली की चमक के पीछे भी बदलता मौसम
अब बात उस मिठाई की, जिसे देखकर शायद ही कोई मना कर पाए–काजू कतली।
भारत में काजू की खेती मुख्य रूप से तटीय और पश्चिमी तथा पूर्वी हिस्सों में होती है। लेकिन काजू की कई plantations बारिश पर निर्भर हैं। बारिश में देरी, कमी या लंबे सूखे की स्थिति फसल की productivity और quality को प्रभावित कर सकती है।
यही कारण है कि काजू क्षेत्र में भी ऐसी varieties की पहचान और विकास पर जोर दिया जा रहा है, जो बदलती परिस्थितियों में बेहतर प्रदर्शन कर सकें।
जलवायु परिवर्तन का असर हमेशा फसल को पूरी तरह बर्बाद करने के रूप में सामने नहीं आता। कभी इसका मतलब कम उत्पादन होता है, कभी गुणवत्ता में बदलाव और कभी किसानों की लागत बढ़ना। लेकिन इन सभी बदलावों का असर अंततः बाजार तक पहुंच सकता है।
और जब काजू महंगा होगा, तो काजू कतली की कीमत पर भी उसका असर पड़ना स्वाभाविक है।
मिठाइयां खत्म नहीं होंगी, लेकिन महंगी जरूर हो सकती हैं
जलवायु परिवर्तन को लेकर सबसे जरूरी बात यह समझना है कि इसका असर हर फसल और हर क्षेत्र में एक जैसा नहीं होता। तापमान, बारिश, मिट्टी, सिंचाई और खेती की तकनीक—इन सभी का संयुक्त प्रभाव फसल की स्थिति तय करता है।
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि climate change की वजह से गुलाब जामुन या लड्डू खत्म हो जाएंगे। लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि अगर मौसम की अनिश्चितता बढ़ती रही और कृषि उत्पादन पर दबाव बना रहा, तो इन मिठाइयों के ingredients की कीमत और उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
यही वजह है कि कृषि वैज्ञानिक climate-resilient crops, बेहतर irrigation और water-use efficiency पर जोर दे रहे हैं। ICAR के शोध कार्यक्रमों में भी climate-resilient agriculture और प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर प्रबंधन को प्राथमिकता दी जा रही है।
मिठाई की दुकान से खेत तक जुड़ी है पूरी कहानी
किसी मिठाई के डिब्बे को हम आमतौर पर खुशी, त्योहार और परंपरा के प्रतीक के रूप में देखते हैं। लेकिन उसमें मौजूद हर ingredient हमें भारत की कृषि और मौसम से जोड़ता है।
गुलाब जामुन की चाशनी में गन्ना है, जलेबी के घोल में गेहूं है, लड्डू में चना है और काजू कतली में काजू। इनके पीछे लाखों किसानों की मेहनत और प्राकृतिक परिस्थितियां हैं।
इसलिए Climate Change Indian Sweets की कहानी सिर्फ मिठाइयों के महंगे होने की कहानी नहीं है। यह उस बड़े बदलाव की कहानी है जिसमें जलवायु परिवर्तन हमारी खेती, खाद्य आपूर्ति और रोजमर्रा की पसंद तक को प्रभावित कर रहा है।
हो सकता है आने वाले वर्षों में मिठाइयां हमारी थाली से गायब न हों, लेकिन उनकी कीमत, उपलब्धता और बनाने का तरीका बदल जाए। आखिरकार, गुलाब जामुन से लेकर काजू कतली तक–हर मिठास के पीछे एक खेत है, और उस खेत की कहानी मौसम लिखता है।
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